गरीबी से जंग जीतकर कैसे आई ए एस बना जूते बेचने वाला लड़का

दुनिया में कुछ बच्चे ऐसे होते हैं, जिनके जीवन में बचपन बहुत कम समय के लिए आता है। आज हम आपको एक ऐसे लड़के की कहानी बताने जा रहे हैं जिसने गरीबी से लड़कर कामयाबी को गले से लगाया है और अपने परिवार वालों को भी गर्व को एहसास करवाया है।

एक समय ऐसा था कि इसके पास पढ़ने कर के लिए कुछ नहीं था और आज ये लड़का एक बड़ा अफसर बन गया है।इस लड़के ने पिता का हाथ बंटाने काम में अपना पूरा सहयोग किया लेकिन उसने अफसर बनने के अपने सपने को भी जिंदा रखा। ये कहानी है शुभम गुप्ता की।

शुभम का बचपन था कठिनाइयों भरा :-

शुभम गुप्ता राजस्थान के रहने वाले हैं और उनके सर पर काफी कम उम्र में ही अपनी पिता के साथ मिलकर घर की जिम्मेदारियों को निभाने का भोज आ गिरा था, लेकिन उनके परिवार ने कभी शुभम को इन सभी जिम्मेदारियों की भट्टी में नहीं झोंका।

परिवार के हालात को समझते हुए शुभम ने खुद यह निर्णय लिया और अपने पिता के साथ लग गए काम पर। शुभम गुप्ता का बचपन भी जिम्मेदारियां निभाते बीता है, वेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी।

पढ़ाई में काफी अच्छी थे शुभम गुप्ता:-

शुभम अपने पिता के साथ काम में उनकी मदद करने लगे। शुभम स्कूल से आने के बाद चार बजे तक दुकान पहुंच जाते थे और रात तक वहीं रहते थे और ऐसा होता था कि वो यहीं कुछ समय निकालकर पढ़ाई भी कर लिया करते थे। तब शुभम 8वीं कक्षा में थे। 8वीं कक्षा से 12वीं कक्षा तक यानी पांच साल उन्होंने ऐसे ही अपना जीवन जिया। शुभम ने अपनी दसवीं की क्लास काफी अच्छे अंको से पास की थी।

शुभम ने दिल्ली के एक कॉलेज से बी.कॉम और उसके बाद एम.कॉम पूरा किया। इसके बाद उन्होंने सिविल सर्विसेस में जाने का मन बनाया। उनके पिता के जीवन में कई बार ऐसी स्थितियां आयीं कि उन्हें लगा कि काश उनका बच्चा अफसर बने। उन्होंने एक बार शुभम से यूं ही कह दिया कि तुम कलेक्टर बन जाओ। और इस बात को बेटे ने दिल पर ले लिया।

कभी हार नहीं मानी शुभम ने:-

शुभम के मन में I आई ए एस बनने की एक इच्छा थीl सबसे पहली बार साल 2015 में इसके लिए प्रयास किया, लेकिन प्री भी पास नहीं कर पाये। दूसरे प्रयास में शुभम का सेलेक्शन हो गया, लेकिन उन्हें 366 रैंक मिली। इसके तहत मिलने वाले पद से वे संतुष्ट नहीं थे। तीसरी बार साल 2017 में फिर परीक्षा दी, इस साल भी उनका कहीं चयन नहीं हुआ।

इतनी बार हार का सामने करने के बावजूद भी शुभम का हौंसला कभी कम नहीं हुआ और उन्होंने दोगुनी मेहनत से तैयारी की। इसी का परिणाम था कि चौथे प्रयास में शुभम न केवल सभी चरणों से सेलेक्ट हुये बल्कि उन्होंने 6वीं रैंक भी हासिल की।

शुभम ने अपनी पिछली गलतियों से सबक लिया और हिम्म्त हारने के बजाय डबल जोश के साथ परीक्षा दी। अपनी सालों की मेहनत का फल आखिरकार उन्हें मिला और उनका और उनके पिताजी का सपना साकार हुआ

शुभम की कहानी हमें यह सीख देती है कि अगर ठान लो तो मुश्किल कुछ भी नहीं। चाहे कितनी भी हार का सामना करना पड़े पर तब तक लगे रहो जब तक मंजिल न मिल जाये।

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