अक्षय का अर्थ होता है “जो कभी खत्म ना हो” और इसीलिए ऐसा माना जाता है कि अक्षय तृतीया वह तिथि है जिसमें सौभाग्य और शुभ फल का कभी क्षय नहीं होता। मान्यता है कि इस दिन कोई भी शुभ व मांगलिक कार्य किये जा सकते हैं।इस पवित्र दिवस को अक्षय तीज और आखा तीज के नाम से भी जाना जाता है।

हिंदू कलैंडर के हिसाब से वैशाख शुक्ल की तृतीया को हर वर्ष अक्षय तृतीया मनाई जाती है। ऐसे में इस साल भी यानि 2021 में अक्षय तृतीया 14 मई शुक्रवार के दिन मनाई जाएगी। अक्षय तृतीया को सनातन धर्म में एक अबूझ मुहूर्त भी माना जाता है। यानि इस दिन किसी भी श्रेष्ठ कर्म को करने के लिए मुहूर्त नहीं देखना होता।

इस बार अक्षय तृतीया पर ग्रहों का ऐसा संयोग बना है जो इस दिन को और शुभ और प्रभावशाली बना रहा है। इस अक्षय तृतीया पर लक्ष्मी योग नाम का शुभ योग बन रहा है। यह योग सुख, धन, वैभव और समृद्धि के लिए काफी शुभ माना जाता है।

ज्योतिष के जानकारों के अनुसार इस दिन धन-धान्य की देवी माता लक्ष्मी की  पूजा  का भी खास विधान है। वहीं इस समय फैल रही कोरोना वायरस महामारी को देखते हुए इस बार घर में हर पूजा करें और मां लक्ष्मी का ध्यान करें। इसके अलावा इस दिन किसी मदद चाहने वाले व्यक्ति को दान करना बहुत पुण्य फलदायी रहेगा।

अक्षय तृतीया या आखा तीज से जुडी कई हिन्दू कथाये प्रचलित हैं। जो भी हो यह कथाएं रोचक हैं। तो आइये जानते हैं अक्षय तृतीया से जुडी इन पौराणिक कथाओं को –

1) पौराणिक मान्यता अनुसार गंगा नदी को जिस दिन भागीरथ धरती पर लाये थे वह शुभ दिन अक्षय तृतीया का दिन था। हिन्दू धर्म में गंगा नदी का बहुत बड़ा महत्त्व है। सच्चे दिल से पश्चाताप होने के उपरांत गंगा नदी में स्नान करने से मनुष्य के पाप नष्ट होते हैं।

2) महाभारत काल में सम्राट युधिस्ठिर को अक्षय तृतीया के दिन ही “अक्षयपात्र” की प्राप्ति हुई थी। इस चमत्कारी पात्र में से कभी भी भोजन समाप्त नहीं होता था। इसी मान्यता अनुसार इस दिन पर किया जाने वाला दान और धर्म कार्य भी अक्षय माना जाता था।

3) धार्मिक मान्यता अनुसार अच्छे वर की प्राप्ति, और संतान प्राप्ति के लिये अक्षय तृतीया व्रत करना चाहिये। माँ पार्वती भी इस व्रत के प्रताप से हर एक जन्म में शिवजी को पाती हैं। देवी इंद्राणी ने अक्षय तृतीया व्रत के प्रताप से ही संतान सुख पाया था। उन्हे इस व्रत के प्रताप से “जयंत” नामक पुत्र की प्राप्ति हुई थी।

4) पंजाबी समुदाय के जाट लोग अक्षय तृतीया के दिन सुबह ब्रह्म मूरत पर अपने खेत- खलिहान पर जाकर खेती-बाड़ी काम-काज शुरू करते हैं। खेत पर जाते वक्त रास्ते में अगर पशु पक्षी मिले तों यह दृश्य आने वाले मौसम में अच्छी फसल और भरपूर बारिश का सांकेतक होता है। अक्षय तृतीय का दिन मौसम के बदलाव का सूचक भी होता है।

5) भगवान कृष्ण के मित्र सुदामा जब अत्यंत गरीबी में जीवन व्यतीत कर रहे थे तब उन्हे उनकी पत्नी ने कृष्ण भगवान से सहायता मांगने को कहा था और तब सुदामा द्वारिका में कृष्ण भगवान से मिलने आए थे, यह दिव्य प्रसंग जब हुआ तब भी अक्षय तृतीया का दिन था। और जैसा की हम जानते हैं कृष्ण भगवान ने निर्धन सुदामा की सारी दरिद्रता दूर कर के उन्हें सुखी-सम्पन्न बना दिया था।

6) अक्षय तृतीया का दिवस किसानों के लिये अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन उड़ीसा राज्य में भगवान जगन्नाथ की भव्य रथ यात्रा निकाली जाती है।

7) अक्षय तृतीया के दिन विष्णु भगवान ने छठी बार परशुराम स्वरूप में अवतार लिया था। ऐसा कहा जाता है की परशुराम त्रेता युग एवं द्वापर युग में अमर रहे थे। परशुराम के माता पिता का नाम ऋषि जमदगनी तथा रेणुका देवी था। अक्षय तृतीया के दिन को परशुराम जयंती के रूप में भी मनाया जाता है।

8) यह भी मान्यता है कि भगवान के दरबार के मुख्य खजांची कुबेर ने शिवपुरम में शिवजी की तपस्या कर के अक्षय तृतीया के दिन उन्हे प्रसन्न किया था। शिवजी ने कुबेर को जब वरदान मांगने को कहा तब कुबेर ने अपना सारा धन और संपत्ति माँ लक्ष्मी से पुनः पाने का वर मांगा। तभी शिवजी ने कुबेर को लक्ष्मी पूजन करने की सलाह दी थी। उसी दिन से अक्षय तृतीया पर लक्ष्मी पूजन की प्रथा शुरू हो गयी।

10) एक मान्यता के अनुसार महाभारत काल में दुर्योधन के आदेश पर जब दुशास्शन ने द्रौपदी का चीर-हरण किया था तब द्रौपदी की लाज बचाने के लिये उसे श्री कृष्ण भगवान ने कभी ना खत्म होने वाली साड़ी का दान दिया था। द्रौपदी चीर हरण के समय जब कृष्णभगवान ने द्रौपदी की लाज बचाई वह दिन भी अक्षय तृतीया का दिन था।

पौराणिक तथ्यों को ध्यान में लेने पर तो अक्षय तृतीया एक महत्वपूर्ण पावन दिवस है ही, परंतु वैसे भी अन्न दान, वस्त्र दान, वृक्ष आरोपण, और भजन कीर्तन सद्गुणों के सूचक हैं। वैसे तो अच्छे कार्यों के लिये दिवस नहीं देखे जाते पर फिर भी पौराणिक मान्यताओं के आधार पर अगर किसी दिन को शुभ कार्यों का दिन बता कर मनाया जाता है तो उस प्रथा का समर्थन और सम्मान ज़रूर करना चाहिए।

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