Success Story Of IAS Ramesh Gaolap

सपने देखने चाहिए.सपनो को देखने में कोई हर्ज नहीं है इंसान का जीवन में सपने महत्वपूर्ण होते है उसे जीवन की प्रति अपने रवेये ओर उसके लिए मेहनत करना सीखते है.लेकिन कुछ सपने ऐसे होते है जिसे देखने पर हमारा दिल भी कह देता है नहीं हो पाएगा.अगर सच्ची लगन हो दिल में अटूट विश्वास हो खुद पर उन सपनों को भी पूरा क्या जा सकता है.

देश के महान कवि दिनकर जी अनेक कविताएं लिखी जो हमे सफलता का बोध कराती है.उनकी कविता की एक पक्ती है”मानव जब जोड़ लगता है पत्थर भी पानी बन जाता है.इस पक्ति का मामुल है कि इंसान जब अपना सब कुछ अपने सपने के लिए लगा देता मेहनत करता है तो पत्थर के समान वो सपना भी पूर्ण हो जाता है.आज आपको एक ऐसे की जिन्दगी के बारे में बताएंगे जिसने गरीबी के आलम में आइएएस बनने का सपना देखा था जो असंभव सा था|

लेकिन उसके अथक प्रयास और पूर्ण रूप से न्योछावर होकर अपने सपने के लिए बहुत ही कड़ी मेहनत की और आइएएस बन कर दिखाया.


यह कहानी है महाराष्ट्र में रहने वाले एक गरीब बच्चे की को अपनी जिंदगी का गुजारा करने ले लिए अपनी मां के साथ चूड़ियां बेचता था।.अपनी जिंदगी की जरूरत को पूरा करने के लिए अपनी मां के साथ घूम घूम कर चूड़ियां बेचता था.उसका ‌‌।नाम रमेश घोलाप है इनका जन्म सोलापुर जिला के वारसी तहसील के महागाव में हुआ था.पिता एक साइकिल रिपेयर की दुकान चलाते थे लेकिन वह अपनी सारी आमदनी को शराब में लगा देते थे|


सरकारी स्कूल में अपनी पढ़ाई पूरी की

गांव सरकारी स्कूल से मैट्रिक पास की थी व उसके बाद उनके .पिता का देहांत हो गया।. अब घर की सारी जिम्मेदारियां उन पर आ गई.पूरा परिवार इंदिरा गांधी आवास योजना के तहत मकान में रहा करते थें।


जिंदगी में आभाव का प्रभाव पड़ना


मैट्रिक में अभावो के बावजूद 88.50% हासिल किए.मां ने अपने बेटे के पढ़ाई की तरफ ललक और रुझान देख कर खुद जिम्मा उठाया उसे पढ़ाने का.मां ने गांव गांव घूम कर चूड़ियां बेची, बर्तन साफ किए अपना पेट काट कर अपने बच्चे को पढ़ने के लिए हर भरसक प्रयास किया और उसे पढ़ने के लिए बाहर भेज दिया रमेश शहर की आबोहवा में भी अपने सपने के प्रति वफादार रहा.सम्पूर्ण मेहनत ओर तैयारी के दम पर मेहनत करते रहे शहर में रहते हुए पेंटिंग करना,पोस्टर चिपकाने आदि काम भी किया जिस से आमदनी आ जाए। प्रथम प्रयास में उनको सफलता नहीं पायी लेकिन दिवितीय प्रयास मे 2011 में यूपीएससी का एक्जाम 287 रैंक के साथ पास किया.


उनके सपने का साकार होना

उनका ये सपना पूरा हुआ को बचपन में देखा था । इस सपने में उनकी मां का किरदार एकदम ही अहम है जिन्होंने उसे कभी कमी महसूस नहीं होने दी।.
रमेश घालोप 2012 में अफसर बनने के बाद अपने गांव गए.ग्राम वासियों ने जोरदार स्वागत किया क्योंकि वह उनके गांव के प्रथम व्यक्ति थे जो एक आइएएस अफसर बने थे
बच्चो व स्टूडेंट्स के रोल मॉडल बने आइएएस रमेश घपोल सेमिनार में बच्चो का भी मार्गदर्शन कर चुके है.वाकई सपने पूरे करने की ललक हो तो पूरी कायनात उसको पूरा करने में लग जाती है ।


इनके जीवन में शाहरुख खान की फिल्म का यह डायलाग बहुत ही फिट बैठता है


या यूं कहें तो रमेश घोलाप सर का जीवन बहुत ही संघर्ष से भरा रहा इतने आभाव होने के बावजूद उन्होंने ने अपनी परिस्थितियों व स्थिति से कभी निराश नहीं हुए और कठिन मेहनत कर अपने मुकाम तक पहुंच ही गए . रमेश घोलाप जी की स्टोरी बहूत ही इंस्पायरिंग है

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