ईश्वर को पाने के लिए अहंकार का त्याग अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि अहंकार ही रावण है, जब तक अहंकार रूपी रावण का हम स्वयं मर्दन नहीं करेंगे तब तक सत्यरूप ईश्वर के दर्शन असंभव है।

क्या है अहंकार

अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है,जो मनुष्य अहंकार करता है ,उसकी  समाज में कोई इज्ज़त नहीं होती I वह मनुष्य अकेला रह जाता है I  वह सारे रिश्ते खो देता है I कोई भी उससे बात करना पसंद नहीं करता , क्योंकि अहंकारी मनुष्य हमेशा दूसरों को हमेशा नीचा दिखता है I

गलती करना अहंकार नहीं, गलती को स्वीकार ना करना, अहंकार है । कोई हमें, हमारे हित के लिए समझाए तो उसकी बातों को अनसुना कर, कोई अपनी ही चलाए, यह अहंकार है ।

अहंकार के लक्षण

जब कोई ओमकार को भूल जाए, यह अहंकार का पहला लक्षण है। जब कोई खुद को ही सर्व श्रेष्ठ बताए ,यह अहंकार का दूसरा लक्षण है। जब हम को छोड़कर “मैं ” आ जाए, यह अहंकार का तीसरा लक्षण है ।सिर्फ मेरा ही सम्मान हो, यह भाव मन में आए तो यह अहंकार का चौथा लक्षण है ।

प्रगति में मनुष्य का अहंकार बहुत बड़ा बाधक है- अहंकार के वशीभूत होकर चलने वाला मनुष्य प्राय: पतन की ओर ही जाता है। अहंकार से भेद बुद्धि उत्पन्न होती है जो मनुष्य को मनुष्य से ही दूर नहीं कर देती, अपितु अपने मूलस्रोत परमात्मा से भी भिन्न कर देती है। परमात्मा से भिन्न होते ही मनुष्य में पाप प्रवृत्तियां प्रबल हो उठती हैं।

लोक-परलोक का कोई भी श्रेय प्राप्त करने में अहंकार मनुष्य का सबसे विरोधी तत्व है लौकिक उन्नति अथवा आत्मिक प्रगति पाने के लिए किए जाने वाले प्रयत्नों में अहंकार का त्याग सबसे प्रथम एवं प्रमुख प्रयत्न है। इसमें मनुष्य को यथाशीघ्र तत्पर हो जाना चाहिए।

अहंकार के त्याग से उन्नति का मार्ग तो प्रशस्त होता ही है साथ ही निरहंकार स्थिति स्वयं में भी बड़ी सन्तोष एवं शांतिदायक होती है। सिकंदर को बिश्व विजय की लालसा थी लेकिन वह भी यहां से खाली हाथ गया। इसलिए ज्ञान हो, बल हो, धन, या यश हो इस पर जरा भी घमंड न करें।

अहंकार को कैसे कम किया जा सकता है।

अहंकार ऐसा अवगुण है जिसे व्यक्ति समय रहते यदि दूर कर दे तो उसका जीवन धन्य हो जाता है, व्यक्ति यदि अहंकार को दूर करने में अक्षम रहता है तो उस व्यक्ति का जीवन अंधकार की तरफ बढ़ने लगता है I

जबतक व्यक्ति के द्वारा किए जाने वाले कार्य में जन कल्याण की भावना नहीं होगी तब तक कोई भी कार्य सफल नहीं माना जा सकता है I जनकल्याण की भावना अहंकार से दूर रहकर ही आ सकती है I

अहंकार करने वाला व्यक्ति कभी श्रेष्ठ नहीं कहलाता

व्यक्ति कितनी ही प्रतिभाशाली क्यों न हो यदि वह अहंकार दिखाता है , तो उसके द्वारा किए गए बड़े कार्य भी अपनी विशिष्टता को त्याग देते हैं ,जब व्यक्ति सही और गलत का भेद करने में अक्षम हो जाता है, तो उसके सफल होने की संभावना क्षीण होने लगती हैं I

अहंकार त्यागने से होने वाले लाभ

ईश्वर की कृपा पाने के लिए सबसे पहले अहंकार का त्याग करना होगा। जब मनुष्य अहंकार का त्याग करता है ,तभी समाज में उसकी इज्ज़त होती हैI वह मनुष्य सब के दिलों में राज़ करता है  Iविनम्रता की भावना पैदा होती है ,और वह सबसे प्रेम से बात करता है और सब को एक बराबर समझता है I वह मनुष्य सब की मदद करता है I

सूर्य को खुली आँखों से देखना कठिन है, लेकिन इसमें भी एक संदेह है। वह कह रहा है कि मुझे क्या देख रहे हो, मेरे प्रकाश से लाभ उठाओ, जबकि अहंकारी कहता है कि मुझे देखो। ऐसे अहंकार से बचना हो तो बुद्धि पर ही न टिकें, बल्कि हृदय की ओर यात्रा करें।

बुद्धि के क्षेत्र में तर्क है, हृदय के स्थल में प्रेम और करुणा है। अहंकार यहीं से गलना शुरू होता है। अपनी प्रतिभा के बल पर आप कितने ही लोकप्रिय और मान्य क्यों न हो, पर अहंकार के रहते अशांत जरूर रहेंगे। अहंकार छोड़ने का एक आसान तरीका है मुस्कराना। अहंकार का त्याग करके मनुष्य ऊँचाई को प्राप्त कर सकता है। अतः मुस्कराइए, सबको खुशी पहुँचाइए और अहंकार को भूल जाइए।

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